तेरे बिना
आज फिर दिल को फ़ुरसत मिली, आज फिर वही याद आने लगे हैं,
दिल के ज़ख्म फिर ताज़ा हुए, वक़्त को जिन्हें भरने में ज़माने लगे हैं..
ये आज ही की बात न थी, अक्सर हम इस दिल को समझाते हैं,
ज़ुबान पर फिर भी तेरा नाम रुकता नहीं, सनम तुझे हम भूल नहीं पाते हैं..
**
बेकरार ढूंढता था कभी जिस साये को मैं हर महफ़िल में,
छुपाने ज़िंदगी रूपी उस किताब की सादगी शब-ए-दिल में..
तब वो हुए हमसे मुख़ातिब और लम्हा ठहर सा गया,
तार्रूफ़ ना हो पाया पर उल्फ़त क्या है, ये इल्म खूब हुआ..
**
ऐतराज़ ना किया कभी जब हम छुपकर दीदार लगे थे करने,
जिनकी राहों में फूल तो क्या नज़रों तक को बिछाया था हमने..
हर मोड़ पर रूबरू होकर एक अफ़साना छोड़ दिया बनने,
आदत ऐसी थी कि लब सी दिए, कि इस ख़ामोशी को समझा ना कभी तुमने..
**
तुम्हें अपना कहने की चाह में कभी हो सके हम किसी के नहीं,
अब इस दिल में हैं चुभती हुई यादें, और ये दर्द ठहरता भी नहीं..
पर क्या करें, इस दिल को ज़ख़्मों से तसल्ली भी नहीं,
कहता है गर ग़म से ख़ाली दिल हो तो जीने का मज़ा ही नहीं..
**
सोचा था भुला दूँगा कि चाहत में ज़िंदगी कभी थी मुस्कराई,
मुश्किल था, ना था बहुत आसान भुलाना ख्वाब की वो परछाईं..
पर ए काश कहीं मिल जाए वो मीत, दोहराए रचक इस रचना का,
पा प्रीति उस ब्राहमी रूपी कलिका की, हो अर्थ सफल जीवन समर का..
**